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अयोध्या विवाद पर होगी मध्यस्थता ? SC आज सुनाएगा फैसला

From Court Room

राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजा जाए या नहीं, सुप्रीम कोर्ट आज इस पर आदेश देगा। दरअसल, कोर्ट चाहता है कि 70 साल से भी अधिक समय से जारी अयोध्या विवाद का मध्यस्थता के जरिए सर्वमान्य समाधान निकाला जाए। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह केवल जमीन का नहीं बल्कि लोगों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला है।
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों को सुना था। अब पीठ अगर मामले को मध्यस्थता के जरिए समाधान करने के लिए भेजती है तो इसे साहसिक निर्णय माना जाएगा क्योंकि हिंदू पक्ष इस कदम का विरोध कर रहे हैं और उन्होंने इसे समय की बर्बादी करार दिया है। आपको बता दें कि इस पीठ में CJI के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।
मुस्लिम पक्ष और निर्मोही अखाड़े ने सौंपे नाम
पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से मध्यस्थों के नाम सुझाने को कहा था। मुस्लिम पक्षों और निर्मोही अखाड़े ने अलग-अलग नाम सौंप दिए हैं। हालांकि अन्य हिंदू पक्षों ने मध्यस्थता का विरोध किया है और इस कारण उन्होंने कोई नाम भी नहीं सौंपे हैं। गौरतलब है कि पहले भी चार बार मध्यस्थता के प्रयास किए गए लेकिन असफल रहे।
HC के फैसले के खिलाफ 14 अपीलों पर सुनवाई
शीर्ष अदालत ने विवादास्पद 2.77 एकड़ भूमि तीन पक्षकारों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर-बराबर बांटने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई के दौरान मध्यस्थता के माध्यम से विवाद सुलझाने की संभावना तलाशने का सुझाव दिया था।
मध्यस्थ के तौर पर ये नामआए
निर्मोही अखाड़ा जैसे हिंदू संगठनों ने सेवानिवृत्त जजों – जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस एके पटनायक और जस्टिस जीएस सिंघवी के नाम मध्यस्थ के तौर पर सुझाए हैं जबकि स्वामी चक्रपाणी धड़े के हिंदू महासभा ने पूर्व चीफ जस्टिस- जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस (सेवानिवृत्त) एके पटनायक का नाम प्रस्तावित किया है।
बाबर के नाम का जिक्र
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को प्रमुखता से कहा था कि मुगल शासक बाबर ने जो किया उसपर उसका कोई नियंत्रण नहीं है और उसका सरोकार सिर्फ मौजूदा स्थिति को सुलझाने से है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसका मानना है कि मामला मूल रूप से तकरीबन 1,500 वर्ग फुट भूमि भर से संबंधित नहीं है बल्कि धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है।
वहीं, यूपी सरकार की ओर से सलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि कोर्ट को यह मामला उसी स्थिति में मध्यस्थता के लिए भेजना चाहिए जब इसके समाधान की कोई संभावना हो। उन्होंने कहा कि इस विवाद के स्वरूप को देखते हुए मध्यस्थता का मार्ग चुनना उचित नहीं होगा।

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